Thursday, 15 October 2026 | 4:26 AM
भारत

जंतर-मंतर से हटाया प्रदर्शन स्थल का दर्जा, लोकतांत्रिक विरोध पर नई बहस

दिल्ली के जंतर-मंतर को प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। लेख के अनुसार, तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुँचे तीन युवाओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया। प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड जैसे वैकल्पिक स्थान बताए गए हैं। इस घटनाक्रम ने यह बहस तेज कर दी है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के लिए स्थान और अवसर उपलब्ध कराना कितना जरूरी है। मामले से जुड़े आरोपों और कानूनी पहलुओं पर अदालत का निर्णय आना बाकी है।
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जंतर-मंतर से हटाया प्रदर्शन स्थल का दर्जा, लोकतांत्रिक विरोध पर नई बहस
जंतर-मंतर को प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटाए जाने के फैसले ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह की उपलब्धता पर सवाल खड़े किए हैं। *(प्रतीकात्मक तस्वीर)*
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कल सुबह कुछ लड़के हाथ में तिरंगा लेकर जंतर-मंतर का गेट फाँदकर अंदर कूदे। "भारत माता की जय" बोला। और दस मिनट में उठा लिए गए। सौरव दास, आशुतोष रांका, अजिंक्य शिंदे, तीनों फिर हिरासत में। दो दिन पहले ही इन्हीं से लिखवाया गया था कि साल भर शांति भंग नहीं करेंगे।
उन्होंने शांति भंग नहीं की। उन्होंने बस एक ऐसी जगह पर कदम रखा जो सोमवार तक प्रदर्शन-स्थल थी और मंगलवार को नहीं रही।
हाँ, यह हुआ है। दिल्ली पुलिस ने सोमवार को एक नोटिस निकाला, "समिति की अनुशंसा पर" जंतर-मंतर को प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। कौन-सी समिति, किसने बनाई, कब बैठी, नोटिस में नहीं है। बदले में तीन मैदान मिले हैं, रामलीला, बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड। बुराड़ी वही है जहाँ 2020 में किसानों को भेजा गया था और किसानों ने जाने से मना कर दिया था। उन्हें पता था कि बुराड़ी एक खुली जेल है जहाँ आप चिल्ला सकते हैं पर कोई सुनता नहीं।
अभिजीत दीपके ने एक लाइन लिखी, "Resistance cannot be denotified." मैं इसका हिंदी करूँ तो, प्रतिरोध को अधिसूचना से नहीं मिटाया जा सकता। मुझे यह वाक्य इसलिए अच्छा लगा कि इसमें गुस्सा नहीं है, इतिहास है। जंतर-मंतर कोई सरकारी आदेश से बना प्रदर्शन-स्थल नहीं था। वह 1993 में बोट क्लब बंद होने के बाद लोगों ने खुद चुना था। लोगों की चुनी जगह को एक नोटिस से हटाना, ऐसा होता नहीं। जगह नक्शे से हटती है, याद से नहीं।
पर मुझे कल की एक और बात ने ज़्यादा सोचने पर मजबूर किया, और वह बात दीपके ने ही कही।
सोमवार को राहुल गांधी का मार्च निकला। हजारों लोग। अखिलेश, तेजस्वी, प्रियंका, डी.के. शिवकुमार। उन्हें रोका ज़रूर गया, पर उठाया नहीं गया। कोई विमान से नहीं उतारा गया, कोई छत्रसाल स्टेडियम नहीं भेजा गया। और उसी शाम दीपके ने लिखा कि यह संयम एक चाल है, ताकि छात्रों और विपक्ष के बीच अविश्वास पैदा हो, कि देखो, नेताओं को छूट, तुम्हें डंडा।
मैं नहीं जानता यह चाल है या नहीं। पर इसका उल्टा पहलू देखिए। अगर राज्य ने पार्टियों के मार्च को छोड़ा और बिना पार्टी वाले छात्रों को दो बार उठाया, तो राज्य किससे ज़्यादा डरता है? जिनके पास सांसद हैं, या जिनके पास सिर्फ एक तिरंगा और एक गेट फाँदने की हिम्मत है? यह प्रश्न मैं खुद से पूछ रहा हूँ, और इसका उत्तर मुझे ठीक नहीं लग रहा।
अदालत की बात। मंगलवार की सुनवाई टल गई, न्यायमूर्ति मोहना अस्वस्थ थीं, मुख्य न्यायाधीश ने कहा फाइलें पढ़े बिना नहीं। अब इस सप्ताह। मैं न्यायाधीश की तबीयत पर कुछ नहीं कहूँगा, पर इतना याद रखिए कि रविवार का आदेश अब भी खड़ा है, कोई गैरकानूनी हिरासत नहीं। और कल सुबह जो हुआ, वह उसी आदेश के छियासठ घंटे बाद हुआ। गुरुवार को अदालत के सामने एक नया हलफनामा भी होगा, एक प्रदर्शनकारी का, जो कहता है कि हिरासत में मारपीट हुई और निजता में घुसपैठ। अभी यह आरोप है। अदालत तय करेगी।
अन्याय की सबसे बड़ी ताकत लोगों का यह मान लेना है कि अब कुछ नहीं हो सकता। मुझे लगता है सोमवार का वह नोटिस इसी "अब कुछ नहीं हो सकता" की कोशिश था। जगह ही नहीं रहेगी तो इकट्ठा कहाँ होगे। और मंगलवार सुबह गेट फाँदने वाले लड़कों का उत्तर था, जहाँ रोकोगे वहीं।
मेरा प्रश्न इस बार छोटा है।
अगर कल कोई समिति, जिसका नाम आप नहीं जानते, यह अनुशंसा कर दे कि आपके शहर में प्रदर्शन के लिए कोई जगह नहीं बची, तो आप किस मैदान में जाएँगे?