Thursday, 15 October 2026 | 4:27 AM
संपादकीय

देश तब बीमार होता है, जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं

एक देश तब कमजोर होता है, जब सवाल पूछना अपराध और चुप्पी मजबूरी बन जाए। लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थाओं पर जनता के भरोसे को लेकर एक विचारोत्तेजक @ संपादकीय
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देश तब बीमार होता है, जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं
“एक देश कब बीमार होता है, जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं”
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एक देश कब बीमार होता है? तब नहीं जब उसकी सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं। प्रदर्शन तो स्वस्थ शरीर का बुखार है, संकेत कि प्रतिरोधक तंत्र काम कर रहा है। देश तब बीमार होता है जब प्रश्न पूछना अपराध की श्रेणी में आने लगे और उत्तर देना सत्ता की कृपा बन जाए। पिछले कुछ दिनों में मैंने जो देखा, उसे मैं किसी एक घटना के रूप में नहीं पढ़ पा रहा। मुझे एक पैटर्न दिख रहा है, और पैटर्न घटना से ज्यादा डराते हैं। पैटर्न यह है। एक संस्था पर सवाल उठता है। संस्था जवाब देने की जगह चुप रहती है। चुप्पी से असंतोष बढ़ता है। असंतोष सड़क पर आता है। सड़क पर बैरिकेड लगता है। बैरिकेड से अविश्वास बढ़ता है और फिर अविश्वास को "षड्यंत्र" कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह चक्र एक बार पूरा हो जाए तो दूसरी बार अपने आप चलता है, तीसरी बार आदत बन जाता है। मैक्स वेबर ने कहा था कि राज्य वह है जिसके पास वैध बल का एकाधिकार है। इस वाक्य में "वैध" शब्द पर लोग कम ध्यान देते हैं। बल तो हर राज्य के पास होता है। वैधता नागरिक देता है, और वह इसे किसी चुनाव-पत्र पर नहीं, रोज की छोटी-छोटी बातों में देता है या वापस लेता है। जब वह थाने जाने से डरने लगे, जब वह अपने ही नाम को सरकारी सूची में ढूँढ़ने लगे, जब वह सोचने लगे कि फोन पर क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ, तब वैधता रिस रही होती है। और रिसाव की आवाज नहीं होती। अल्बर्ट हर्शमैन का एक सूत्र है, किसी बिगड़ती संस्था के सामने नागरिक के पास तीन रास्ते होते हैं, आवाज, पलायन, या निष्ठा। आवाज यानी शिकायत, प्रदर्शन, याचिका। पलायन यानी देश छोड़ना, वोट न देना, चुप हो जाना। निष्ठा यानी भरोसा कि सुधर जाएगी। अब सोचिए, जो राज्य आवाज का रास्ता बंद करता है, वह नागरिक को कहाँ धकेलता है? पलायन की ओर। और जिस देश के पढ़े-लिखे युवा पलायन चुनने लगें, मन से या पासपोर्ट से, उस देश में बाकी बची निष्ठा भी बहुत दिन नहीं टिकती। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा के अंतिम भाषण में तीन चेतावनियाँ दी थीं। एक यह कि संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों तो आंदोलन अराजकता का व्याकरण है। लोग इस वाक्य का आधा हिस्सा उद्धृत करते हैं और आधा छोड़ देते हैं। पूरा वाक्य शर्त के साथ है, "जब संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों।" यानी दायित्व पहले राज्य का है कि वह रास्ता खुला रखे, तब नागरिक का है कि वह उसी रास्ते से चले। जो राज्य पहले रास्ता बंद करे और फिर नागरिक को अराजक कहे, वह अम्बेडकर को नहीं, अपनी सुविधा को उद्धृत कर रहा है। एक और बात, जो शायद सबसे कठिन है। संस्थाएँ इमारतों से नहीं बनतीं, भरोसे से बनती हैं। एक आयोग तब तक आयोग है जब तक हारने वाला भी मानता है कि वह निष्पक्ष था। जिस दिन हारने वाला यह मानना बंद कर दे, उस दिन आयोग एक सरकारी दफ्तर रह जाता है, चाहे उसका भवन कितना भी भव्य हो। और यह भरोसा वापस लाना उतना ही कठिन है जितना टूटे काँच को जोड़ना। जुड़ भी जाए तो दरार दिखती रहती है। युग-परिवर्तन बाहर से नहीं, व्यक्ति के भीतर से आरंभ होता है। मैं इसे आज ऐसे पढ़ता हूँ, कि जो समाज अपने भीतर प्रश्न पूछने का साहस खो देता है, उसे बाहर से कोई नहीं बचा सकता, और जो समाज यह साहस बचाए रखता है, उसे बाहर से कोई तोड़ नहीं सकता। सत्ता आती-जाती है। बैरिकेड लगते-हटते हैं। जो बचता है वह नागरिक का चरित्र है, या उसका अभाव। और यही मेरी असली चिंता है। मुझे बैरिकेड से उतना डर नहीं लगता जितना उस दिन से जब बैरिकेड की जरूरत ही न पड़े, क्योंकि कोई पूछने वाला बचा ही न हो। तानाशाही कभी घोषणा से नहीं आती। वह उस सुबह आती है जब करोड़ों लोग एक साथ तय करते हैं कि आज चुप रहना ज्यादा सुविधाजनक है। गांधी ने कहा था, चुप्पी भी एक कर्म है, और उसकी भी एक कीमत है। तो प्रश्न सत्ता से नहीं, आपसे है। जब कोई आपसे पूछे कि आप इस दौर में क्या कर रहे थे, तो आपका उत्तर क्या होगा? मैं देख रहा था? मैं डर रहा था? या मैं पूछ रहा था?