Tuesday, 03 November 2026 | 11:58 PM
संपादकीय

चार बार 'अंतिम' हुई मतदाता सूची, लेकिन नागरिक के लिए तारीख़ एक ही क्यों?

दिल्ली की मतदाता सूची की अंतिम प्रकाशन तिथि बार-बार बदलने और निर्वाचन आयोग के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल 15 बिंदुओं वाले हलफ़नामे ने लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ड्राफ़्ट मतदाता सूची से 47.57 लाख नाम हटाए जाने के मामले में आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है, लेकिन नाम हटाने की प्रक्रिया, नोटिस और सुनवाई से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया। यह लेख आयोग की समय-सारिणी और आम नागरिक की सीमित समय-सीमा के बीच मौजूद असमानता को रेखांकित करता है।
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चार बार 'अंतिम' हुई मतदाता सूची, लेकिन नागरिक के लिए तारीख़ एक ही क्यों?
चार बार अंतिम तारीख़! 47.57 लाख नामों का सवाल निर्वाचन आयोग के हलफ़नामे पर सुप्रीम कोर्ट में जवाबदेही की परीक्षा
सात अक्टूबर। चार नवंबर। चार दिसंबर। बाईस दिसंबर। ये दिल्ली की मतदाता-सूची की चार "अंतिम" तारीख़ें हैं। जो चीज़ चार बार अंतिम हो, उसे सूची नहीं कहते, बहाना कहते हैं। आज की ख़बर यह है कि निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में पंद्रह बिंदुओं का जवाबी हलफ़नामा दिया है। उसमें लिखा है कि SIR के तीनों आदेश, जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 वाले, तीनों आयुक्तों ने सर्वसम्मति से पारित किए। फ़ॉर्म छह में कोई बदलाव नहीं हुआ। कोई एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं हुआ। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को जवाब देने का समय दिया और अगली सुनवाई 17 नवंबर रख दी। पंद्रह बिंदु। और उन पंद्रह बिंदुओं में उस एक सवाल का जवाब नहीं है जो इसी अदालत ने पिछले हफ़्ते पूछा था: दिल्ली की ड्राफ़्ट सूची से सैंतालीस लाख सत्तावन हज़ार नाम हटाते समय क्या आयोग ने दिमाग़ लगाया था? अदालत के शब्द थे "applied its mind"। आयोग का जवाब है "सर्वसम्मति"। सवाल दिमाग़ का था, जवाब हाथ उठाने का आया। अब इन दोनों चीज़ों को एक साथ रखिए, तारीख़ें और हलफ़नामा। क्योंकि असली कहानी यहीं है। आयोग के पास समय है। उसने दिल्ली की अंतिम सूची 7 अक्टूबर से खिसकाकर 22 दिसंबर कर दी, ढाई महीने, बिना किसी को जवाब दिए। उसने अदालत से 17 नवंबर की तारीख़ ले ली। उसने दो आयुक्तों की चौदह असहमतियों को "सर्वसम्मति" लिखने का समय निकाल लिया। उसने सॉफ़्टवेयर का नाम छिपाने के लिए आरटीआई की धारा ढूँढ ली। समय आयोग के पास भरपूर है। नागरिक के पास तारीख़ है 25 नवंबर। उसके पहले उसे फ़ॉर्म भरना है, दादा का प्रमाण ढूँढना है, बूथ अधिकारी को पकड़ना है, और यह घोषणा करनी है कि वह "पहली बार" मतदाता बन रहा है, जबकि उसने सात बार वोट दिया है। उसकी तारीख़ नहीं खिसकती। खिसकती है तो अदालत के "आग्रह" पर, और आग्रह के बाद भी आयोग "विचार" करता है। यही इस पूरे मामले का सबसे कड़वा सच है। संस्था के पास तारीख़ बदलने का अधिकार है। नागरिक के पास तारीख़ पर पहुँचने का दायित्व है। एक के लिए "अंतिम" का मतलब है अगली सूचना तक। दूसरे के लिए "अंतिम" का मतलब है अंतिम। और सैंतालीस लाख सत्तावन हज़ार। यह दिल्ली के कुल मतदाताओं का लगभग एक तिहाई है। एक तिहाई राजधानी को ड्राफ़्ट सूची से बाहर रखा गया और फिर कहा गया कि कैंप लगाए हैं, आकर जुड़ जाओ। सोचिए, अगर किसी बैंक ने एक तिहाई खाताधारकों के खाते "विसंगति" कहकर बंद कर दिए होते और फिर कैंप लगाया होता कि आकर दोबारा खाता खुलवा लो, तो उस बैंक का क्या होता? उसका लाइसेंस जाता। आयोग का हलफ़नामा गया, पंद्रह बिंदुओं वाला। मैं यह नहीं कह रहा कि हर कटा नाम सही था। मरे हुए लोग सूची में होते हैं, दोहरे नाम होते हैं, यह सब सच है। पर एक तिहाई? और उस एक तिहाई में से कितनों को नोटिस मिला, कितनों की सुनवाई हुई, इसका आँकड़ा पंद्रह बिंदुओं में नहीं है। जो है, वह यह है कि सब सर्वसम्मति से हुआ। मानो ग़लती तीन लोग मिलकर करें तो ग़लती नहीं रहती। बाबासाहेब ने कहा था कि क़ानून की नज़र में समानता तभी सच्ची है जब क़ानून तक पहुँचने की दूरी भी समान हो। आज वह दूरी देखिए। आयोग को अदालत तक पहुँचने के लिए एक वकील और पंद्रह बिंदु चाहिए। नागरिक को सूची तक पहुँचने के लिए दादा का जन्म-प्रमाणपत्र चाहिए, जो कभी बना ही नहीं। दोनों "पहुँच" रहे हैं। बस एक पहुँच सकता है, दूसरा कोशिश कर सकता है। तो आज शाम दो काम कीजिए। पहला, अगर आप दिल्ली में हैं तो 25 नवंबर से पहले अपना नाम देखिए, और कटा हो तो फ़ॉर्म भरिए, चाहे उसमें "पहली बार" लिखना पड़े। यह अपमान है, पर वोट उससे बड़ा है। दूसरा, जहाँ भी हैं, 17 नवंबर की तारीख़ याद रखिए। उस दिन अदालत फिर पूछेगी कि दिमाग़ लगाया था या नहीं। जवाब फिर "सर्वसम्मति" आएगा। और उस दिन यह देखना है कि अदालत "आग्रह" करती है या आदेश। जो चीज़ चार बार अंतिम हो, वह पाँचवीं बार भी हो सकती है। बस नागरिक की तारीख़ एक ही रहती है। आपकी क्या है?