संपादकीय
एक संसद लॉन में बैठी थी, दूसरी ट्रेड सीक्रेट में छिपी रही!
दिल्ली में एक तरफ़ कांग्रेस अध्यक्ष के आवास पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के ख़िलाफ़ प्रतीकात्मक जनमहाभियोग आयोजित हुआ, तो दूसरी तरफ़ निर्वाचन आयोग अपनी कार्यप्रणाली और गोपनीयता को लेकर सवालों के घेरे में रहा। एक आयोजन खुला था, लेकिन उसके पास संवैधानिक शक्ति नहीं थी; दूसरी संस्था के पास अपार शक्ति है, लेकिन उसकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह लेख विपक्ष की सीमाओं, निर्वाचन आयोग की जवाबदेही, लोकतांत्रिक असहमति के लिए सिकुड़ती सार्वजनिक जगह और नागरिक के अधिकारों पर तीखी टिप्पणी करता है।
दिल्ली में विपक्ष की प्रतीकात्मक जनसंसद और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली के बीच लोकतंत्र की पारदर्शिता पर सवाल उठाता प्रतीकात्मक दृश्य।
कल दोपहर साढ़े तीन बजे दिल्ली में एक संसद बैठी, जिसके पास कोई ताक़त नहीं थी। और उसी शहर में एक संस्था बैठी रही, जिसके पास सारी ताक़त है। आज की पोस्ट इन दोनों के बीच की है।
पहली संसद दस, राजाजी मार्ग पर बैठी। यह कांग्रेस अध्यक्ष का सरकारी बँगला है। विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के "जन महाभियोग" के लिए शहर में और जगह माँगी थी, नहीं मिली, तो घर के लॉन में कुर्सियाँ लग गईं। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता की। कांग्रेस अध्यक्ष ने "प्रस्ताव" रखा, हर दल से एक वक्ता बोला, नेता प्रतिपक्ष ने समापन किया, और "प्रस्ताव" पारित हो गया। अभियुक्त अनुपस्थित था। उसे बुलाया भी नहीं गया था, और बुलाया जाता तो भी वह न आता। इस महाभियोग का संविधान में कोई वजूद नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त सिर्फ़ उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, अनुच्छेद 324(5), संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से। विपक्ष ने अप्रैल में वह असली रास्ता आज़माया था। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने नोटिस ही स्वीकार नहीं किया। इसलिए आज वह रास्ता लॉन में आ गया।
तो यह नाटक था? हाँ, नाटक था। पर इस नाटक में एक बात ग़ौर करने लायक है। इसमें सब कुछ खुला था। अध्यक्ष का नाम सबको पता, प्रस्ताव रखने वाले का नाम सबको पता, जगह सबको पता, समय सबको पता, कैमरे खुले, आरोप लिखित, और जिस पर आरोप है वह चाहे तो कल जवाब दे सकता है। ताक़त शून्य, पारदर्शिता सौ प्रतिशत।
अब दूसरी संस्था देखिए, जो आज भी निर्वाचन सदन में बैठी रही। उसके पास ताक़त सौ प्रतिशत है। वह तय करती है कि इस देश में कौन मतदाता है। इस हफ़्ते उसने हमें क्या बताया? सॉफ़्टवेयर का नाम: ट्रेड सीक्रेट। नाम काटने वाले अधिकारी की पहचान: जीवन को ख़तरा। दो आयुक्तों की चिट्ठी: चौदह पन्ने, अट्ठाईस रुपये बकाया। सोलह लाख आपत्तियाँ किसने भरीं: पता नहीं। और सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा: सब सर्वसम्मति से। ताक़त सौ प्रतिशत, पारदर्शिता शून्य।
यही आज का असली दृश्य है। इस देश में जिसके पास ताक़त नहीं है, वह सब कुछ खुले में कर रहा है, और जिसके पास ताक़त है, वह सब कुछ बंद दरवाज़े के पीछे। एक लॉन में संसद चल रही है, एक सदन में ट्रेड सीक्रेट। नाटक वहाँ हो रहा है जहाँ ताक़त नहीं है, और जहाँ ताक़त है वहाँ नाटक से भी इनकार है, क्योंकि नाटक के लिए दर्शक चाहिए और दर्शक सवाल पूछते हैं।
मैं विपक्ष का प्रशंसक नहीं हूँ, आज के आयोजन में भाषण ज़्यादा थे और कार्यक्रम कम। और "वोट चोरी" का नारा तब तक नारा ही है जब तक वह अदालत में साबित न हो। पर एक बात मुझे आज खटक गई। एक लोकतंत्र में जब विपक्ष को संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाने के लिए सार्वजनिक जगह न मिले और उसे अपने घर का लॉन इस्तेमाल करना पड़े, तो सवाल विपक्ष पर नहीं उठता, उस शहर पर उठता है जिसमें सवाल पूछने की कोई जगह नहीं बची। जंतर-मंतर गया, रोशनपुरा गया, अब रामलीला मैदान के लिए तीन हज़ार पाँच सौ पुलिस और दो सौ कैमरे। असहमति का भूगोल सिकुड़ते-सिकुड़ते एक आदमी के घर तक आ गया है।
बाबासाहेब ने कहा था कि लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का शत्रु नहीं, सरकार का दर्पण है, और जो सरकार दर्पण तोड़ देती है वह सुंदर नहीं हो जाती, सिर्फ़ अपना चेहरा देखना बंद कर देती है। आज दर्पण एक लॉन में टँगा था। संस्था ने उधर देखा नहीं। पर दर्पण का काम देखे जाने पर नहीं टिकता। वह वहीं टँगा रहेगा।
आज जो हुआ वह नक़ली संसद थी, यह सब मान रहे हैं। मेरा सवाल दूसरा है। जब असली संसद में नोटिस स्वीकार न हो, असली आयोग में सॉफ़्टवेयर गुप्त हो, और असली अदालत "आग्रह" तक सीमित हो, तो एक नागरिक को असली और नक़ली में फ़र्क़ कैसे समझ आए?
आप बताइए। आज आपको कौन-सी संसद ज़्यादा असली लगी?