Monday, 02 November 2026 | 3:32 PM
संपादकीय

एक प्रतिशत नाम संदिग्ध हैं तो 99 प्रतिशत नागरिकों से नागरिकता का सबूत क्यों माँगा जा रहा है ?

अगर मतदाता सूची में एक प्रतिशत नाम संदिग्ध हैं, तो बाकी 99 प्रतिशत नागरिकों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए क्यों खड़ा किया जा रहा है? दस्तावेज़ों की कमी, प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर उठते संवैधानिक सवालों को सामने रखता यह लेख।
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एक प्रतिशत नाम संदिग्ध हैं तो 99 प्रतिशत नागरिकों से नागरिकता का सबूत क्यों माँगा जा रहा है ?
"एक प्रतिशत नाम संदिग्ध हैं तो 99 प्रतिशत नागरिकों से नागरिकता का सबूत क्यों? सवाल मतदाता सूची का ही नहीं, आम आदमी के संवैधानिक अधिकारों का भी है।"
आज रामलीला मैदान में बहुत भाषण हुए। मैं उन भाषणों पर नहीं लिखूँगा। मैं उस एक सवाल पर लिखूँगा जो भाषणों के नीचे दबा रह गया, और जो मंच से ज़्यादा उस आदमी का है जो आज मैदान में नहीं, अपने गाँव में बूथ अधिकारी को ढूँढ रहा था। सवाल यह है। अगर सूची में एक प्रतिशत नाम संदिग्ध हो सकते हैं, तो निन्यानवे प्रतिशत से यह कहना कि अपनी नागरिकता साबित करो, यह किस तर्क से सही है? ज़रा उस आदमी को देखिए जिससे यह कहा जा रहा है। वह अठारह साल का था तो हॉस्टल में रहता था, वहाँ नाम जुड़ा। फिर नौकरी के लिए दूसरे शहर गया, किराए का कमरा, फिर दूसरा कमरा, फिर तीसरा। उसके पिता का जन्म एक गाँव में हुआ जहाँ उस साल कोई रजिस्टर नहीं था, इसलिए स्कूल ने जो तारीख़ लिख दी वही तारीख़ बन गई। दादा का जन्म-प्रमाणपत्र? दादा के ज़माने में ज़िला अस्पताल नहीं था, दाई थी। इस आदमी के काग़ज़ों में "विसंगति" होगी। ज़रूर होगी। क्योंकि इस देश में काग़ज़ आदमी से बाद में आए। और अब वही काग़ज़ उससे पूछ रहे हैं कि तुम हो या नहीं। जब व्यवस्था और नागरिक आमने-सामने हों, तो साबित करने का बोझ उस पर होता है जिसके पास साधन हैं। व्यवस्था के पास अधिकारी हैं, डेटाबेस हैं, अदालतें हैं, पुलिस है, सॉफ़्टवेयर है जिसका नाम तक वह नहीं बताती। नागरिक के पास क्या है? एक फ़टा हुआ राशन कार्ड और दादा की एक धुँधली याद। और बोझ उसी पर डाल दिया गया। क़ानून यह नहीं कहता। 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने लाल बाबू हुसैन के मामले में साफ़ लिखा था कि जो नाम पहले से सूची में है, उसे यूँ ही नहीं हटाया जा सकता; हटाने से पहले जाँच करनी होगी, नोटिस देना होगा, और यह सिद्ध करने का दायित्व रजिस्ट्रीकरण अधिकारी पर है, मतदाता पर नहीं। यानी निर्दोषता की पूर्वधारणा सिर्फ़ फ़ौजदारी अदालत का सिद्धांत नहीं है, वह मतदाता-सूची का भी सिद्धांत है। आज उसे उलट दिया गया है। अब आदमी तब तक संदिग्ध है जब तक वह दादा को लेकर न आए। और दूसरा सवाल, जो पहले से बड़ा है। नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का काम कब से हो गया? संविधान का अनुच्छेद 326 कहता है कि हर वयस्क नागरिक मतदाता होगा। नागरिक कौन है, यह नागरिकता अधिनियम 1955 तय करता है, और उसके तहत यह फ़ैसला केंद्र सरकार का है, उसकी प्रक्रिया अलग है, उसकी अदालत अलग है। आयोग का काम है नागरिकों की सूची बनाना, नागरिक बनाना नहीं। पर जून 2025 के बाद फ़ॉर्म छह के साथ जो घोषणा-पत्र नत्थी हुआ, वह जन्म-तिथि के आधार पर आपको नागरिकता अधिनियम की श्रेणियों में बाँटता है। यानी बूथ का अधिकारी अब यह देख रहा है कि आप 1987 से पहले पैदा हुए या बाद में, आपके माता-पिता भारतीय थे या नहीं। यह मतदाता-सूची नहीं है। यह पिछले दरवाज़े से नागरिकता रजिस्टर है, और यह बात मैं नहीं, आयोग के अपने दो आयुक्त अपने पत्रों में कह चुके हैं। अब इसका अगला क़दम सोचिए, क्योंकि कोई सोच नहीं रहा। अगर मतदाता-सूची में नाम तभी रहेगा जब नागरिकता सिद्ध हो, तो कल मतदाता पहचान-पत्र नागरिकता का प्रमाण बन जाएगा। और जिसका नाम कटा, वह सिर्फ़ वोट से नहीं, नागरिकता के प्रमाण से भी कटा। और मज़ा यह कि आयोग ख़ुद अदालत में कह चुका है कि मतदाता पहचान-पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं है। यानी जो काग़ज़ नागरिकता साबित नहीं करता, उसे पाने के लिए नागरिकता साबित करनी होगी। इस वाक्य को दो बार पढ़िए। यह मैंने नहीं लिखा, यह व्यवस्था ने लिखा है। आज मंच से कहा गया कि साढ़े तेरह करोड़ नाम कटे। यह विपक्ष का आँकड़ा है, आयोग इसे नहीं मानता। ठीक है। आँकड़ा जो भी हो, तो भी सवाल वही है: इन लोगों में से कितनों को नोटिस मिला, कितनों की सुनवाई हुई, और कितनों का नाम उस सॉफ़्टवेयर ने काटा जिसका नाम ट्रेड सीक्रेट है? अगर एक प्रतिशत नाम ग़लत हैं, मरे हुए लोगों के हैं, दोहरे हैं, तो व्यवस्था के पास उन्हें पहचानने के साधन हैं: मृत्यु रजिस्टर, आधार, पुरानी सूची, बूथ अधिकारी का घर-घर सत्यापन। एक प्रतिशत को ढूँढने के लिए निन्यानवे प्रतिशत को कठघरे में खड़ा करना समझदारी नहीं है। यह उस डॉक्टर जैसा है जो एक मरीज़ को बुख़ार हो तो पूरे गाँव को अस्पताल में भर्ती कर ले, और फिर कहे कि जो साबित कर दे कि स्वस्थ है, वह घर जा सकता है। और सबसे कड़वी बात। जो नाम कटेंगे, वे किसके होंगे? वे नहीं जिनके घर में फ़ाइलें रखने की अलमारी है। वे जिनके घर में अलमारी नहीं है। प्रवासी मज़दूर, किराएदार, वह औरत जो शादी के बाद तीन बार ज़िला बदल चुकी है, वह बुज़ुर्ग जिसका नाम स्कूल के रजिस्टर में अलग लिखा गया था। पढ़े-लिखे लोग भी इस चक्की में पिस जाते हैं, मैं ऐसे प्रोफ़ेसरों को जानता हूँ जो तीन महीने से अपना नाम नहीं जुड़वा पाए। तो उस आदमी का क्या होगा जिसे फ़ॉर्म छह पढ़ना भी नहीं आता? बाबासाहेब ने संविधान सभा में कहा था कि वयस्क मताधिकार इस देश का सबसे बड़ा जुआ है और सबसे बड़ी आस्था भी, क्योंकि हम उस आदमी को वोट दे रहे हैं जिसे पढ़ना नहीं आता, इस भरोसे पर कि वोट उसे पढ़ना सिखाएगा। आज वही वोट उससे कह रहा है, पहले पढ़कर दिखाओ, फिर मिलेगा। व्यवस्था के पास अधिकारी हैं, तर्क हैं, तारीख़ें हैं। नागरिक निहत्था है। और निहत्थे से कहा जा रहा है कि अपनी नागरिकता साबित करो। यह रैली का मुद्दा नहीं है। यह उस हर आदमी का मुद्दा है जो आज शाम घर लौटकर पूछेगा कि मेरा नाम है या नहीं। उसे पूछना चाहिए। पर जवाब देने का बोझ उस पर नहीं, उस पर है जिसने सवाल बनाया। आप बताइए। आपके परिवार में कितने लोगों के पास दादा का जन्म-प्रमाणपत्र है? और जिनके पास नहीं है, वे कम भारतीय हैं क्या?