Sunday, 01 November 2026 | 3:26 PM
संपादकीय

एकता के नाम पर दौड़ती सरकार, चलते नागरिकों पर पाबंदी!

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर दिल्ली में सरकार ने 'रन फ़ॉर यूनिटी' का आयोजन किया, लेकिन निर्वाचन आयोग से सवाल पूछने के लिए रामलीला मैदान तक पैदल मार्च करना चाहने वाले नागरिकों को अनुमति नहीं मिली। एक तरफ सरकारी आयोजन के लिए रास्ते खुले हैं, दूसरी तरफ नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर पाबंदियाँ हैं। यह संपादकीय इसी विरोधाभास के बहाने लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है।
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एकता के नाम पर दौड़ती सरकार, चलते नागरिकों पर पाबंदी!
एकता के नाम पर दौड़ती सरकार, चलते नागरिकों पर पाबंदी! — लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों का सवाल।
आज सुबह दिल्ली में सरकार ने एक दौड़ करवाई, "रन फ़ॉर यूनिटी"। कुछ किलोमीटर, पुलिस का घेरा, कैमरे, मंत्री का झंडा, और अंत में पानी की बोतल। बिना अनुमति, क्योंकि अनुमति देने वाला ख़ुद दौड़ रहा था।
कल सुबह उसी दिल्ली में कुछ लोग दो किलोमीटर चलना चाहते हैं। मिंटो रोड से अजमेरी गेट होते हुए रामलीला मैदान तक। इसकी अनुमति नहीं है। आज दोपहर पुलिस ने साफ़ कह दिया, रामलीला मैदान में रैली ठीक है, सुबह दस से शाम पाँच, चौदह ज़ोन, सैकड़ों कैमरे, भाषण ख़त्म होते ही तुरंत तितर-बितर हो जाना। पर मैदान तक पैदल आना? उसके लिए अर्ज़ी नहीं दी गई, और दी जाती तो भी, आप जानते हैं।
एक ही शहर, एक ही दिन, दो दौड़। एक में राज्य दौड़ रहा है और नागरिक ताली बजा रहा है। दूसरी में नागरिक चलना चाहता है और राज्य उसे बता रहा है कि किस गेट से घुसना है, कितने बजे निकलना है, और बीच में किस सड़क पर पैर नहीं रखना है।
आज सरदार पटेल की जयंती है, और मैं उनके बारे में सोच रहा हूँ। उन्होंने पाँच सौ पैंसठ रियासतों को एक देश में मिलाया। कैसे? ज़्यादातर बातचीत से। राजाओं को बुलाया, समझाया, डराया भी, पर अंत में हर रियासत ने विलय-पत्र पर ख़ुद हस्ताक्षर किए। हैदराबाद और जूनागढ़ अपवाद थे, बाकी सब सहमति थी। सरदार की एकता अनुमति से नहीं बनी थी, सहमति से बनी थी। और आज उसी एकता के नाम पर राजधानी में एक नागरिक को दो किलोमीटर चलने की सहमति नहीं है, सिर्फ़ मैदान में बैठने की अनुमति है, दस से पाँच।
ज़रा सोचिए, अगर 1947 में सरदार ने रियासतों से यही कहा होता। आप भारत में शामिल हो सकते हैं, पर सिर्फ़ निर्धारित मैदान में, सुबह दस से शाम पाँच, चौदह ज़ोन में बँटकर, कैमरे की निगरानी में, और विलय का भाषण ख़त्म होते ही तुरंत अपनी रियासत लौट जाइए। कितनी रियासतें मिलतीं? एकता अनुमति-पत्र पर नहीं टिकती। जिस दिन टिकने लगे, समझिए वह एकता नहीं रही, कतार हो गई।
नेता प्रतिपक्ष ने आज कहा कि गृह मंत्री उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान से लोगों को दिल्ली आने से रोक रहे हैं। यह आरोप है, सच कल पता चलेगा। पर इस आरोप से ज़्यादा मुझे आज की एक सच्चाई खटक रही है। राजधानी में इस हफ़्ते दो सौ तिहत्तर अर्धसैनिक कंपनियाँ हैं, कल तीन हज़ार पाँच सौ पुलिसकर्मी और जोड़े जाएँगे, धारा 163 पूरे शहर में लागू है। यह सब किसके लिए? किसी दुश्मन के लिए नहीं। उन लोगों के लिए जो अपने ही देश के निर्वाचन आयोग से पूछना चाहते हैं कि उनका नाम क्यों कटा। एकता दिवस पर राज्य ने अपने नागरिकों के लिए वही तैयारी की है जो वह सरहद पर करता है। फ़र्क़ बस इतना कि सरहद पर सामने वाला भाग सकता है, यहाँ उसे दस से पाँच के बीच बैठना है।
मुझे रैली से कोई मोह नहीं है। भाषण होंगे, नारे लगेंगे, कल शाम तक सब घर लौट जाएँगे, और परसों आयोग का सॉफ़्टवेयर वैसे ही ट्रेड सीक्रेट रहेगा। मेरी चिंता रैली नहीं है। मेरी चिंता वह नक़्शा है जो इस हफ़्ते बना है। जंतर-मंतर बंद। रोशनपुरा बंद। कांग्रेस अध्यक्ष के घर के लॉन में "संसद"। और अब दो किलोमीटर की सड़क बंद, मैदान खुला, दस से पाँच। हर हफ़्ते असहमति का भूगोल थोड़ा सिकुड़ता है, और हर बार कारण "व्यवस्था" होता है। एक दिन नक़्शे पर सिर्फ़ एक मैदान बचेगा, और उस पर भी समय लिखा होगा।
सरदार ने 1947 में आईसीएस के पहले भारतीय बैच से कहा था कि राज्य की असली ताक़त उसकी पुलिस में नहीं, उसके नागरिकों के भरोसे में होती है। आज उसी दिन, उसी शहर में, भरोसे की जगह कैमरे लगे हैं। चौदह ज़ोन में।
तो सवाल यह है, और इसे सोने से पहले सोचिएगा। अगर रामलीला मैदान सुबह दस से शाम पाँच तक खुला है, तो लोकतंत्र किस समय खुलता है? और जो उस समय से बाहर खड़ा है, वह नागरिक है या अनुमति का इंतज़ार करता कोई और?