Wednesday, 23 September 2026 | 3:14 PM
जीवनी

रामेश्वरम से राष्ट्रपति भवन तक: ऐसे बनी एपीजे अब्दुल कलाम की महान पहचान

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष, विज्ञान, शिक्षा और देशसेवा की प्रेरणादायक कहानी है। साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाले कलाम को भारत में अक्सर 'मिसाइल मैन' के नाम से याद किया जाता है।
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रामेश्वरम से राष्ट्रपति भवन तक: ऐसे बनी एपीजे अब्दुल कलाम की महान पहचान
रामेश्वरम से राष्ट्रपति भवन तक: ऐसे बनी एपीजे अब्दुल कलाम की महान पहचान
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 भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन संघर्ष, विज्ञान, शिक्षा और देशसेवा की प्रेरणादायक कहानी है। साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाले कलाम को भारत में अक्सर 'मिसाइल मैन' के नाम से याद किया जाता है।

डॉ. अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। उन्होंने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और आगे चलकर भारत के अंतरिक्ष तथा रक्षा कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ISRO से शुरू हुआ वैज्ञानिक सफर

डॉ. कलाम ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO में काम करते हुए भारत के स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह SLV-III के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे। इसी कार्यक्रम के तहत जुलाई 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया।

इसके बाद उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में देश के स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। वह इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम से जुड़े और अग्नि तथा पृथ्वी जैसी मिसाइल प्रणालियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

क्यों कहलाए 'मिसाइल मैन'?

भारत की स्वदेशी मिसाइल क्षमता को विकसित करने में उनकी भूमिका के कारण डॉ. कलाम को 'मिसाइल मैन ऑफ इंडिया' के नाम से लोकप्रियता मिली। वैज्ञानिक के तौर पर उन्होंने देश की रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भरता से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में काम किया।

1992 से 1999 तक वह रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव रहे। इसके बाद उन्होंने सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।

देश के 11वें राष्ट्रपति बने

विज्ञान की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के बाद डॉ. कलाम ने राजनीति के पारंपरिक रास्ते से अलग एक वैज्ञानिक और शिक्षक की पहचान के साथ देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक सफर तय किया।

25 जुलाई 2002 को उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक रहा।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी कलाम की सबसे बड़ी पहचान युवाओं और विद्यार्थियों से जुड़ी रही। वह देशभर के छात्रों से संवाद करते थे और उन्हें विज्ञान, शिक्षा तथा राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते थे।

सम्मान और पुरस्कार

डॉ. कलाम को देश के प्रमुख नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) और भारत रत्न (1997) से सम्मानित किया गया। उन्हें कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों से मानद डॉक्टरेट भी प्राप्त हुए।

किताबों के जरिए भी युवाओं से जुड़े

डॉ. कलाम ने अपने विचारों और अनुभवों को किताबों के माध्यम से भी लोगों तक पहुंचाया। उनकी चर्चित पुस्तकों में 'Wings of Fire', 'India 2020', 'My Journey' और 'Ignited Minds' शामिल हैं। इन पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ।

शिक्षक के रूप में आखिरी दौर

राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी डॉ. कलाम सक्रिय रहे। उन्होंने अन्ना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर काम किया और देशभर के विद्यार्थियों से संवाद जारी रखा। उनका मानना था कि युवाओं के सपनों और उनकी ऊर्जा के जरिए भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।

छात्रों के बीच ही थम गई जिंदगी

27 जुलाई 2015 को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का निधन हुआ। वह उस समय शिलॉन्ग में विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे। उनका पूरा जीवन विज्ञान, शिक्षा और युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के संदेश से जुड़ा रहा।

डॉ. कलाम की कहानी आज भी इसलिए याद की जाती है क्योंकि उन्होंने वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ-साथ विद्यार्थियों और युवाओं के बीच सपने देखने और उन्हें मेहनत से पूरा करने का संदेश लगातार दिया। उनके जीवन का सफर रामेश्वरम से शुरू होकर ISRO और DRDO की प्रयोगशालाओं से गुजरते हुए राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा।