Monday, 05 October 2026 | 3:42 AM
संपादकीय

झोलाछाप डॉक्टर न हों तो मचे देश में हाहाकार! : आदर्श कुमार

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झोलाछाप डॉक्टर न हों तो मचे देश में हाहाकार! : आदर्श कुमार
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भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अक्सर बड़े अस्पतालों, महंगे इलाज और विशेषज्ञ डॉक्टरों की चर्चा होती है, लेकिन देश के गांवों और छोटे कस्बों की जमीनी तस्वीर इससे कहीं अलग है। यहां आज भी बड़ी संख्या में लोग स्थानीय स्तर पर इलाज कराने के लिए ऐसे व्यक्तियों पर निर्भर हैं, जिन्हें आम भाषा में ‘झोलाछाप डॉक्टर’ कहा जाता है।

विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था में बिना मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय योग्यता के इलाज करना कानून और मरीज की सुरक्षा—दोनों के लिहाज से गंभीर सवाल खड़ा करता है, उसी व्यवस्था में ऐसे लोग कई इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच एक तरह की अनौपचारिक भूमिका निभाते दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं है कि बिना योग्यता इलाज करने वाले लोगों को डॉक्टर क्यों कहा जाता है। सवाल यह है कि आखिर गरीब और ग्रामीण मरीज उनके पास पहुंचने को मजबूर क्यों होते हैं? कई गांवों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच आसान नहीं होती। कहीं डॉक्टर नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होते, कहीं विशेषज्ञ चिकित्सा की सुविधा नहीं होती और कहीं मरीज को मामूली बीमारी के लिए भी जिला अस्पताल या बड़े शहर का रुख करना पड़ता है। ऐसे में गांव में ही मौजूद व्यक्ति मरीज को तुरंत दवा दे देता है। मरीज को सुविधा मिलती है और उसका खर्च भी कम होता है।लेकिन इस सुविधा की कीमत कभी बहुत भारी पड़ सकती है।

बिना पर्याप्त चिकित्सकीय प्रशिक्षण के बीमारी का सही निदान न होना, गलत दवा देना, अनावश्यक एंटीबायोटिक या इंजेक्शन का इस्तेमाल करना और गंभीर बीमारी को सामान्य समझ लेना मरीज की जान तक खतरे में डाल सकता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब तक मरीज को सही चिकित्सा सुविधा मिलती है, तब तक बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है। फिर भी केवल झोलाछाप डॉक्टरों को दोष देकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। 

कल्पना कीजिए कि आज गांवों और दूरदराज के इलाकों में मौजूद सभी अनधिकृत उपचारकर्ताओं पर तत्काल रोक लगा दी जाए। क्या हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था उसी क्षण हर गांव के प्रत्येक मरीज को प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए तैयार है? यही वह सवाल है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में अभी भी क्षेत्रीय अंतर दिखाई देता है। जब तक हर गांव के नजदीक पर्याप्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी, जरूरी दवाएं और समय पर रेफरल की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक लोग स्थानीय और अनौपचारिक उपचार के विकल्प तलाशते रहेंगे। इसलिए लड़ाई केवल ‘झोलाछाप डॉक्टरों’ के खिलाफ नहीं होनी चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें किसी गरीब परिवार को मजबूरी में अनधिकृत व्यक्ति से इलाज कराने की जरूरत ही न पड़े। 

बिना योग्यता चिकित्सा करना मरीजों के लिए जोखिम है और इस पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। लेकिन इसके साथ सरकार और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि आम नागरिक को सुलभ, किफायती और भरोसेमंद चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि झोलाछाप डॉक्टर क्यों मौजूद हैं?

बड़ा सवाल यह है कि देश के हर गांव में ऐसा स्वास्थ्य तंत्र कब होगा, जहां मरीज को इलाज के लिए मजबूरी में किसी अनधिकृत चिकित्सक का सहारा न लेना पड़े? जब इस सवाल का जवाब मिल जाएगा, तब शायद ‘झोलाछाप डॉक्टर’ की जरूरत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी।